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स नः॑ पावक दीदिहि द्यु॒मद॒स्मे सु॒वीर्य॑म्। भवा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ अन्त॑मः स्व॒स्तये॑॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa naḥ pāvaka dīdihi dyumad asme suvīryam | bhavā stotṛbhyo antamaḥ svastaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। नः॒। पा॒व॒क॒। दी॒दि॒हि॒। द्यु॒ऽमत्। अ॒स्मे इति॑। सु॒ऽवीर्य॑म्। भव॑। स्तो॒तृऽभ्यः॑। अन्त॑मः। स्व॒स्तये॑॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:10» मन्त्र:8 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:8» मन्त्र:3 | मण्डल:3» अनुवाक:1» मन्त्र:8


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पावक) अग्नि के तुल्य पवित्रकारक विद्वान् पुरुष ! आप (स्तोतृभ्यः) विद्याओं के प्रचार करनेवाले (अस्मे) हम लोगों को (द्युमत्) प्रशंसा करने योग्य सद्विद्या के विज्ञान से युक्त (सुवीर्य्यम्) श्रेष्ठ धन दीजिये (सः) वह आप (नः) हम लोगों को (दीदिहि) प्रकाशित करो (स्वस्तये) सुख प्राप्ति के लिये (अन्तमः) समीप में वर्त्तमान (भव) हूजिये ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वज्जन जो कि स्वयं पवित्र हैं, उनको चाहिये कि औरों को भी विद्या और उत्तम शिक्षा से पवित्र करें, जिससे सम्पूर्ण पुरुष मित्र होकर सुख करने के लिये समर्थ हों ॥८॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

हे पावक विद्वन् ! त्वं स्तोतृभ्योऽस्मे द्युमत्सुवीर्य्यं देहि स त्वं नो दीदिहि स्वस्तयेऽन्तमो भव ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) (नः) अस्मान् (पावक) वह्निवत्पवित्रकारक (दीदिहि) प्रकाशय (द्युमत्) प्रशस्तविज्ञानयुक्तम् (अस्मे) अस्मभ्यम् (सुवीर्य्यम्) शोभनधनम् (भव)। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (स्तोतृभ्यः) विद्याप्रचारकेभ्यः (अन्तमः) समीपस्थः (स्वस्तये) सुखप्राप्तये ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वद्भिः स्वयं पवित्रैरन्ये विद्यासुशिक्षाभ्यां पवित्राः सम्पादनीया यतः सर्वे सखायः सन्तः सुखाय प्रभवेयुः ॥८॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे विद्वान लोक स्वतः पवित्र आहेत, त्यांनी इतरांनाही विद्या व सुशिक्षणाने पवित्र करावे. ज्यामुळे सर्वजण मित्र बनून सुख देण्यास समर्थ व्हावेत. ॥ ८ ॥